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मैं जागता रहा..!!!

खामियाज़ा सपनो का,
कुछ यूँ भुगतता रहा |
रात ढलती रही,
और मैं जागता रहा ||

ख्वाहिशो के पीछे,
इस कदर लगता रहा |
वक़्त गुजरता रहा और मैं,
मौत की तरफ भागता रहा ||

जिंदगी की दौड़ में,
हर रोज़ फंसता रहा |
देख दुनिया को मैं,
खुद पर ही हँसता रहा ||

साख बनाने को समाज में,
खुद का अरमान घुटता रहा |
सांस लेता रहा पर,
जिंदगी जीना छूटता रहा ||

सब “ठीक है” कह कर,
खुद को ही ठगता रहा !
रात ढलती रही,
और मैं जागता रहा…………..||

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Author:

Not organized, But you will not find it messy. Not punctual, But will be there at right Time. Not supportive, But will be there, when needed. Not a writer, But you will find this interesting.

21 thoughts on “मैं जागता रहा..!!!

  1. अंतर्द्वंद को शब्दों की माला में अच्छे से पिरोया है आपने रोहित भाई! शुभकामनायें

    Liked by 1 person

  2. जी हाँ जनाब!!ख्वाहिशे है ही ऐसी फितरत लिए कि हर ख्वाहिश पे दम निकले-बहुत निकले मेरे अरमाँ फिर भी कम निकले —बकौल गालिब ।

    Liked by 1 person

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