Posted in Emotions, Hindi, Love, Personal, Poetry

कभी-कभी ।।

यूँ तो खामोश हूँ,
पर कुछ बात उमड़ती है ।
कभी-कभी ।।

सो जाता हूँ अक्सर,
बिन सोये कुछ रात गुजरती है ।
कभी-कभी ।।

पता है तुम्हे,चमक है तुम में ।
जो मेरे आँखों में चमकती है,
कभी-कभी ।।

एक खुशबू है तुम में ।
जो मेरी रूह में महकती है,
कभी-कभी ।।

कुछ बात है तुम में ।
जो मेरी ख़यालात से मिलती है,
कभी-कभी ।।

बंजारन हो तुम ।
जो मेरे मन में भटकती है,
कभी-कभी ।।

दीपक की ज्योति हो तुम ।
जो अँधेरा भगाती है मेरा,
कभी-कभी ।।

परी हो तुम ।
जो मेरे सपनो में उड़ती हो,
कभी-कभी ।।

वैसे तो ज़ज्बात बहुत है ।
पर अब लिखता हूँ बस,
कभी-कभी ।।

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गुनाह !!!

हाँ, मैंने चोरी की !!!
पर खुद क लिए नहीं,
उसके लिए की |
जो अपना सबकुछ,
हँस के दुसरो को दे देती है ||
जो सबके हर तकलीफ,
हँस के सुन लेती है |
जो अपने सारे गम,
चुपचाप सह लेती है ||

हाँ, मैंने चोरी की !!!
चुराया मैंने,
अपने जिंदगी से
कुछ लम्हे |
बस उसके लिए ||
उन लम्हो में ,
मैं उसे हँसाऊँगा |
उसे उसकेहोने का,
एहसास दिलायूँगा ||

हाँ, मैंने चोरी की !!!
बस और बस उसके लिए,
और अगर इस गुनाह
की सजा मौत है |
तो जनाब !!!
नहीं डरता मैं मौत से ||

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अच्छा सुनो !

अच्छा सुनो !
ये जो “Forever” शब्द,
के साथ कार्ड दी थी |
उसे फाड़ दू, जला दू ?
या फिर सारी बातें
past में बना दू ?

अच्छा सुनो !
ये जो तुम कांच की,
dancing couple दी थी |
उन्हें तोड़ दू, कहीं झोक दू ?
या फिर उनको
वही रोक दू ?

अच्छा सुनो !
वो जो फूल बना,
रुमाल छूटा था मेरे पास |
उसे तुम्हे लौटा दू ?
या फिर टूटे वादों के
आंसू उसमे ही बहा दू ?

अच्छा सुनो !
वो जो कविताये,
लिखी थी तुमपर |
उसके हर लफ्ज़ मिटा दू ?
या फिर अब उनसब को
इस ज़माने को दिखा दू ?

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मोहब्बत !!

कैसी है ये मोहब्बत,
जिससे दामन तुम बचा जाते |

बस अपने ही ख्यालो से,
तुम दिनों रात जगा जाते ||

ना बरसा था बादल फिर भी,
तुम सबकुछ यूँ भीगा जाते |

बिन छुवे तुम पर्वत को,
उसकी बर्फ पिघला जाते ||

जो नैन-नक्ष तेरे तीखे थे,
पूरी नदियाँ घुमा जाते |

चुप थे तेरे लब्ब फिर भी,
नैना तेरे सब बता जाते ||

कैसी है ये मोहब्बत,
जिससे दामन तुम बचा जाते |

बस अपने ही ख्यालो से,
तुम दिनों रात जगा जाते ||

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परछाईं !!

मेरी एक परछाईं थी ||
जब आया मैं दुनिया में,
मेरे साथ वो आयी थी |
ना ही कोई रूप था उसका,
ना ही कोई रंग लायी थी |
मेरी एक परछाईं थी ||

ना ही कोई गुरुर उसे,
खुद पर ना कभी इतरायी थी |
ना जलती थी धूप में वो,
रात से ना वो घबराई थी |
मेरी एक परछाईं थी ||

ना ही उसके नखरे थे,
ना ही कोई लड़ाई थी |
थी झील सी शांत वो,
समुंद्र सी उसकी गहराई थी |
मेरी एक परछाईं थी ||

मुझमे कुछ भी अच्छा हो,
या फिर कोई बुराई थी |
भूल के सारे तथ्यों को वो,
मेरा साथ निभाई थी |
मेरी एक परछाईं थी ||

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एक हसीना !!

भूखा हूँ तेरे कुछ लफ्ज़ का,
प्यासी है नज़रे तेरी एक झलक को |
बिन तुझे देखे, ना मैं इफ्तार करूँगा ||

माना की तू हसीन, ईद के चाँद सी,
पर एक दफा निकल तू |
खुद की आँखों में, तुझे गिरफ्तार करूँगा ||

बंद कर लूंगा तुझे मैं,
दिल की बोतल में इस कदर |
जब जी चाहे तो, तेरा दीदार करूँगा ||

तू खुद पूछेगी मुझसे,
“ऐसी क्या खूबी है मुझमे” |
इतना टूट कर तुझे मैं प्यार करूँगा ||

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तड़प !!

तरस गयी हूँ, घूमने के लिए,
बारिश में भीगने के लिए |

एक चाय का प्याला पीने के लिए,
कुछ पल उनके साथ जीने के लिए ||

उनकी आँखो में खोने के लिए,
कंधे पर सिर रख रोने के लिए |

तरस गए हम वक़्त पाने के लिए,
उनके मन के ज़ज्बात जानने के लिए ||

तरस गए है, उनसे प्यार जताने के लिए,
वो मेरे है, इस ख़ुशी पर इतराने के लिए |

प्यार के एहसास महसूस करने के लिए,
छोटी-छोटी बातों पर मोहब्बत से लड़ने के लिए ||

प्यार से उनको कुछ खत लिखने के लिए,
खत पढ़ कर,उनके अल्फ़ाज़ सुनाने के लिए |

पर उनके पास मेरे लिए वक़्त कहाँ है,
खुश है वहीं, वो अब जहाँ है ||

उसके लिए भी तो बादल बरसता होगा,
भीगने के लिए वो भी तरसता होगा ||

उसे भी तो कुछ बताना होगा ना,
शायद मुझसे प्यार जाताना होगा ना |

हकीकत ना सही ये सब,
सपने पुरे ख्वाब में करेंगे|
मिलने दो कभी,
हर एक तड़प हिसाब में करेंगे ||

Idea Credit & Original poem – “RITIKA”.  Modified by – “ROHIT”

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Love & Pen…

जब तक मृग जैसे नैन तेरे,
और गर्दन तेरी सुराही है |
तब तक हम लिखेंगे ||

जब तक मैं हूँ साथ तेरे,
और तू मेरी हमराही है |
तब तक हम लिखेंगे ||

जब तक तू है किताब मेरी,
और तेरी आँखें मेरी पढाई है |
तब तक हम लिखेंगे ||

जब तक दिल में है प्यार मेरे,
और कलम में स्याही है |
तब तक हम लिखेंगे ||

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इश्क़ !!

बता दे पता अपनी गली का
बिन देखे तुझे,अब गुजारा नहीं होता

खोया रहता हूँ दिन-ओ-रात तुझमे
होश हमें अब, हमारा नहीं होता

जानता हूँ, तेरा देख कर मुस्कुराना
इश्क़ का इशारा नहीं होता

जो समझ जाता दिल ये बात तो
मैं आशिक़ तुम्हारा नहीं होता

बता दे पता अपनी गली का
बिन देखे तुझे,अब गुजारा नहीं होता

जो होती खबर, तेरी दर की तो
शहरो में, मैं आवारा नहीं होता

होता पानी फिर भी नैन में,
पर दुःख से, वो खारा नहीं होता

तेरी एक झलक मिल जाती तो
इश्क़ में, दिल बेसहारा नहीं होता

बता दे पता अपनी गली का
बिन देखे तुझे,अब गुजारा नहीं होता