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बलात्कार….एक खेल !!

चलो एक खेल खेलते है !
मैं दर्द से चीखूंगी,
तुम मेरा मुँह दबा देना ।
मैं कह ना सकूँ किसी से,
मौत की नींद सुला देना ।
मैं अपनी इज़्ज़त हारूँगी,
तुम अपनी मर्दांनगी जीत लेना ।
मैं शरीर त्याग दूंगी,
तुम हवस की दीवानगी जीत लेना ।

चलो एक खेल खेलते है !
तू मेरी उम्र मत देखना,
और अपनी उम्र से मुँह मोड़ लेना ।
लूट ले मेरी इज़्ज़त मन भर पर,
और माँ-बहनो को छोड़ देना ।।
मन ना भरे जो तेरा तो,
हफ्तों – महीनो कैद कर लेना ।
नेता, पुलिस सबको मिला कर,
अपना काला मन सफ़ेद कर लेना ।।

चलो एक खेल खेलते है !
तू अकेला जीत जायेगा,
पूरी इंसानियत हार जाएगी ।
‘Candle march’ कर के,
दुनिया मुझे क्या ख़ाक न्याय दिलाएगी ।।
मेरी आपबीती पर,
कभी जरा गौर तू फरमाना ।
मेरे दर्द का बस एक हिस्सा,
अपनी बेटी को बताना ।।
जो किया तूने मेरे संग,
उनसब से उसे बचा लेना ।
या रब इतनी सी मिन्नत है की,
मुझे फिर कभी बेटी मत बनाना ।।

चलो एक खेल खेलते है !
तुम मेरा बलात्कार कर देना,
सारे मर्दो को शर्मसार कर देना ।
खुद के कर्मो पर गुमान कर लेना,
ले कर जान मेरी, तू अपना नाम कर लेना
चलो एक खेल खेलते है !

 

Image Credit – Google

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ख़ामोशी…एक चीख

एक अर्सा बीत गया था,
एक-दूसरे को कुछ बताये हुए |
बेख़ौफ़ नज़रे मिलाये हुए,
एक साथ मुस्कुराये हुए ||
कुछ गांठे पड़ गयी थी,
मन में बातें छुपाये हुए |
ग़लतफ़हमी बिन सुलझाए हुए,
हालत को दोषी बनाये हुए ||

फिर वो दोनों साथ बैठे है,
खुद को खुश दिखाए हुए  |
कुछ न हुआ ये जताये हुए,
अंदर के तूफान को छुपाये हुए ||
रूह के सवालो को दबाये हुए,
मन के शोर को खामोश कराये हुए |
सब कुछ अच्छा बताये हुए,
चेहरे पे मुस्कान चिपकाये हुए ||

फिर वो दोनों साथ बैठे है,
खुद को खुश दिखाए हुए |
सब कुछ अच्छा बताये हुए,
चेहरे पे मुस्कान चिपकाये हुए ||

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लम्हे !!

मीलो की दूरी थी,
मुलाकातें भी अधूरी थी |
तेरे होने का एहसास था,
तेरा हर लम्हा मेरे पास था ||

दूरी तो कम हो गयी,
कुछ एक मुलाकातें भी हों गयी |
न जाने क्यों सबकुछ खो गया,
तूने  पराया किया ही, अब वो लम्हा भी पराया हो गया ||

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अच्छा सुनो !

अच्छा सुनो !
ये जो “Forever” शब्द,
के साथ कार्ड दी थी |
उसे फाड़ दू, जला दू ?
या फिर सारी बातें
past में बना दू ?

अच्छा सुनो !
ये जो तुम कांच की,
dancing couple दी थी |
उन्हें तोड़ दू, कहीं झोक दू ?
या फिर उनको
वही रोक दू ?

अच्छा सुनो !
वो जो फूल बना,
रुमाल छूटा था मेरे पास |
उसे तुम्हे लौटा दू ?
या फिर टूटे वादों के
आंसू उसमे ही बहा दू ?

अच्छा सुनो !
वो जो कविताये,
लिखी थी तुमपर |
उसके हर लफ्ज़ मिटा दू ?
या फिर अब उनसब को
इस ज़माने को दिखा दू ?

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तड़प !!

तरस गयी हूँ, घूमने के लिए,
बारिश में भीगने के लिए |

एक चाय का प्याला पीने के लिए,
कुछ पल उनके साथ जीने के लिए ||

उनकी आँखो में खोने के लिए,
कंधे पर सिर रख रोने के लिए |

तरस गए हम वक़्त पाने के लिए,
उनके मन के ज़ज्बात जानने के लिए ||

तरस गए है, उनसे प्यार जताने के लिए,
वो मेरे है, इस ख़ुशी पर इतराने के लिए |

प्यार के एहसास महसूस करने के लिए,
छोटी-छोटी बातों पर मोहब्बत से लड़ने के लिए ||

प्यार से उनको कुछ खत लिखने के लिए,
खत पढ़ कर,उनके अल्फ़ाज़ सुनाने के लिए |

पर उनके पास मेरे लिए वक़्त कहाँ है,
खुश है वहीं, वो अब जहाँ है ||

उसके लिए भी तो बादल बरसता होगा,
भीगने के लिए वो भी तरसता होगा ||

उसे भी तो कुछ बताना होगा ना,
शायद मुझसे प्यार जाताना होगा ना |

हकीकत ना सही ये सब,
सपने पुरे ख्वाब में करेंगे|
मिलने दो कभी,
हर एक तड़प हिसाब में करेंगे ||

Idea Credit & Original poem – “RITIKA”.  Modified by – “ROHIT”

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कुर्बान !!

फूल और हवा का,
ये किस्सा पुराना है |
न है मोहब्बत फूल को,
पर हवा को, फूल पाना है ||

इस दुनिया में ऐसा,
और भी कई अफसाना है |
अपनी ताकत की तैश में लोगो को,
एक तरफ़ा मोहब्बत को पाना है ||

पहले तो उन्हें अपना,
प्यार दिखाना है |
मना करने पर,
उन्हें और डराना है ||

कहने को तो मोहब्बत सा पाक,
कहते है खुद को |
पर न हासिल होने पर,
तेजाब से चेहरा जलाना है ||

एक दिन इसी तैश में,
हवा ने फूल को पाना चाहा |
न करने पर फूल को,
उसने डरना चाहा ||

खुद क गुरुर में,
हवा ने फूल से कहा,
मैं झोंका हूँ हवा का,
तुझे मैं जबरदस्ती उड़ा ले जायूँगा |

टूट कर अपनी डाल से
फूल ने जवाब दिया,
मर जाउंगी, पर तेरी न हो पाऊँगी
ख़ाक हो कर भी, खुशबू फैला जाउंगी ||

माना की नाज़ुक हूँ,
पर तुझसे न डर जाउंगी |
तू जी लेना किस्से बहादुरी के ले कर,
मैं तो लड़की हूँ, मैं ही मर जाउंगी ||