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Diversity & Inclusion

Thoda tu alag, Thoda main alag
Kehna ye kitna asan hai
Socha kbhi, Ek hai hum ?
Kyunki Pahle hum insan hai

Rang alag, dharm alag
Alag apna makan hai
Sarhadien kheechi hai zameen par
Par sabka ek ashman hai

Umar alag, soch alag
Alag sabka mukam hai
Raste alag, humsafar alag
Par manzil sabki masaan hai

Tujhse nhi, mujhse nhi
“Humse” ye jahaan hai
Laakh alag par ek hai hum
Kyunki pahle hum insan hai

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Ek Sham !!!

मुद्दतो बाद, खुले आसमान में ,
एक हसीं शाम लिए बैठा हूँ |
बेफ़िक्रों के माफ़िक़, तक रहा परिंदो को,
ना कोई सोच, ना कोई काम लिए बैठा हूँ ||

चाहत, अरमान और ख्वाहिशों को छोड़ कर,
ना कोई दुआ, ना कोई सलाम लिए बैठा हूँ |
आज़ाद कर खुद को, फ़िक्रों से आज,
ना कोई दर्द, ना कोई इंतकाम लिए बैठा हूँ ||

शून्य कर खुद के दिलो दिमाग को,
खुद को खोजने आज, बिन ज़ाम लिए बैठा हूँ |
एक अरसा बीत गया इसे, उसे और सबको खुश करते,
भूल कर सब, बस अपना ही नाम लिए बैठा हूँ ||

कहने को तो एक शाम है, हर रोज़ जैसा,
पर कुछ पल खुद को इनाम दिए बैठा हूँ |
मुद्दतो बाद, खुले आसमान में ,
एक हसीं शाम लिए बैठा हूँ ||

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बातें !!!

बातें !
कितनी अजीब होती है,
हसांती है,
रुलाती है,
बुरी लग जाये तो,
लोगो के मुँह फुलाती है !!

बातें !
कितनी हसीन होती है,
दुःखों में तो रुला जाती है,
ख़ुशी में नचा जाती है,
वक़्त पर कह दो, कई दफा,
कई रिश्ते बचा जाती है ।।

बातें !
कितनी दमदार होती है,
ख़ुशी को बढ़ा देती है,
गम को बाँट देती है,
दिल से करो गर किसी से,
मिलो की दूरी पाट देती है ।।

बातें !
कितनी खतरनाक होती है,
कुछ को बदनामी देती है,
घायल कर रूह को, निशानी देती है,
कहने को तो सिर्फ कुछ बात है,
पर जिंदगी भर की कहानी देती है ।।

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दूर तक जाना है !!

कुछ पाया है, कुछ अभी पाना है,
आँखों में ख्वाब है, ख्वाहिशो का ठिकाना है ।
लड़खड़ा जाये कदम तो, डरना नहीं ,
एक सफर है ये, बहुत दूर तक जाना है ।।

हौसलों का साधन है, अरमानो का आशियाना है,
कुछ सीख है, कुछ जिंदगी का अफसाना है ।
रुका हूँ कुछ पल, जिंदगी का लुत्फ़ उठाने को,
थका नहीं हूँ, अभी तो जीतने को जमाना है । ।

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वक़्त !

अपने पल खुद से चुरा रहा हूँ ,
अँधेरे में बैठ कर मुस्कुरा रहा हूँ ।
कभी फिर आ कर आज़मा लेना ए-वक़्त,
बदला नहीं हूँ, बस खुद को छुपा रहा हूँ ।।

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अब मैं…..!!!

डगमगा रहे है कदम,
पर लड़खड़ाता नहीं हूँ ।
टूटता हूँ मैं रोज़,
पर चिल्लाता नहीं हूँ ।।

बहुत कश्मकश है रूह की,
चुप हो जाता हूँ, बताता नहीं हूँ ।
ऐसा होता, वैसा होता सब सोचता हूँ,
अपने फैसलों पर पछताता नहीं हूँ ।।

डर तो आज भी बहुत लगता है,
पर अब मैं घबराता नहीं हूँ ।
शिकायतें तो मुझे भी बहुत है ,
मगर हर बात मैं जताता नहीं हूँ ।।

माफ़ कर देता हूँ हर शख्श को पर,
बुरा क्या लगा, ये भुलाता नहीं हूँ ।
थक गयी है आँखें, सारे फरेब देख कर,
बस बंद करता हूँ,कभी आँखों को सुलाता नहीं हूँ ।।

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जिंदगी……एक सच !!!

उम्र क पड़ाव पर,
इस कदर चलते गए ।
कदमो में ज़ख्म थे,
पर आगे बढ़ते गए ।।

‘हम’ और ‘समाज’ ,
इस कदर लड़ते गए ।
समाज दोष देता रहा,
‘हम’ बदलते गए ।।

नाकामयाबियों की कसक,
इस कदर पलती गयी ।
स्वाभिमान की आग थी,
और रूह जलती गयी ।।

हर शाम जिंदगी के पन्ने,
इस कदर लिखते गए ।
जरुरत जीतती रही और,
शौक बिकते गए ।।

जीने की कोशिश ।
इस कदर करते गए ।
जिन्दा, तो क्या पता,
हर रोज़, कई दफा मरते गए ।।

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अबला नारी नहीं !!!

अबला नारी नहीं,
विराज हूँ मैं ।
खुली किताब नहीं,
गहरी राज़ हूँ मैं ।।
बस एक जिस्म नहीं,
बुलंद आवाज़ हूँ मैं ।
एक दो पल नहीं,
पूरी की पूरी आज हूँ मैं ।।

फूल सी सुकुमारी नहीं,
बदलाव का आगाज़ हूँ मैं ।
बस कोमल,दयालु और सहनशील नहीं,
दुनिया का हर एक जज़्बात हूँ मैं ।।
रंग रूप से ही नहीं,
दिलो से भी मुमताज़ हूँ मैं ।
अबला नारी नहीं
भूत, भविष्य, आज हूँ मैं ।।

धुल नहीं कदमो की,
मुकुट और सरताज हूँ मैं ।
अबला नारी नहीं,
ब्रम्हांड, दुनिया और समाज हूँ मैं ।।
अबला नारी नहीं मैं
दिये की आग हूँ मैं ।
कुछ एक शब्द नहीं,
सरगम और राग हूँ मैं ।।
बस अबला नारी नहीं मैं ।
घरो का चिराग हूँ मैं ।।

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एक जानवर …..इंसान !

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

जो कमाता है,
और भूखे भी खुद मर जाता है ।
कपडे पहनता है,
और फाड़ कर, इज़्ज़त भी लूट जाता है ।।

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

रिश्ते रखता है,
और उन्हें ही, शर्मशार कर जाता है।
खुद के उगाये अन्न में,
खुद ही ज़हर मिलता है।।

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

जाति-धर्म के नाम पर,
हर पल रक्त बहता है।
मारने को खुद को,
तरह-तरह के हथियार बनता है।।

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

Image Credit – Google

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मैं जागता रहा..!!!

खामियाज़ा सपनो का,
कुछ यूँ भुगतता रहा |
रात ढलती रही,
और मैं जागता रहा ||

ख्वाहिशो के पीछे,
इस कदर लगता रहा |
वक़्त गुजरता रहा और मैं,
मौत की तरफ भागता रहा ||

जिंदगी की दौड़ में,
हर रोज़ फंसता रहा |
देख दुनिया को मैं,
खुद पर ही हँसता रहा ||

साख बनाने को समाज में,
खुद का अरमान घुटता रहा |
सांस लेता रहा पर,
जिंदगी जीना छूटता रहा ||

सब “ठीक है” कह कर,
खुद को ही ठगता रहा !
रात ढलती रही,
और मैं जागता रहा…………..||