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अबला नारी नहीं !!!

अबला नारी नहीं,
विराज हूँ मैं ।
खुली किताब नहीं,
गहरी राज़ हूँ मैं ।।
बस एक जिस्म नहीं,
बुलंद आवाज़ हूँ मैं ।
एक दो पल नहीं,
पूरी की पूरी आज हूँ मैं ।।

फूल सी सुकुमारी नहीं,
बदलाव का आगाज़ हूँ मैं ।
बस कोमल,दयालु और सहनशील नहीं,
दुनिया का हर एक जज़्बात हूँ मैं ।।
रंग रूप से ही नहीं,
दिलो से भी मुमताज़ हूँ मैं ।
अबला नारी नहीं
भूत, भविष्य, आज हूँ मैं ।।

धुल नहीं कदमो की,
मुकुट और सरताज हूँ मैं ।
अबला नारी नहीं,
ब्रम्हांड, दुनिया और समाज हूँ मैं ।।
अबला नारी नहीं मैं
दिये की आग हूँ मैं ।
कुछ एक शब्द नहीं,
सरगम और राग हूँ मैं ।।
बस अबला नारी नहीं मैं ।
घरो का चिराग हूँ मैं ।।

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एक जानवर …..इंसान !

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

जो कमाता है,
और भूखे भी खुद मर जाता है ।
कपडे पहनता है,
और फाड़ कर, इज़्ज़त भी लूट जाता है ।।

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

रिश्ते रखता है,
और उन्हें ही, शर्मशार कर जाता है।
खुद के उगाये अन्न में,
खुद ही ज़हर मिलता है।।

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

जाति-धर्म के नाम पर,
हर पल रक्त बहता है।
मारने को खुद को,
तरह-तरह के हथियार बनता है।।

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

Image Credit – Google

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मैं जागता रहा..!!!

खामियाज़ा सपनो का,
कुछ यूँ भुगतता रहा |
रात ढलती रही,
और मैं जागता रहा ||

ख्वाहिशो के पीछे,
इस कदर लगता रहा |
वक़्त गुजरता रहा और मैं,
मौत की तरफ भागता रहा ||

जिंदगी की दौड़ में,
हर रोज़ फंसता रहा |
देख दुनिया को मैं,
खुद पर ही हँसता रहा ||

साख बनाने को समाज में,
खुद का अरमान घुटता रहा |
सांस लेता रहा पर,
जिंदगी जीना छूटता रहा ||

सब “ठीक है” कह कर,
खुद को ही ठगता रहा !
रात ढलती रही,
और मैं जागता रहा…………..||

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मेरे अल्फ़ाज़ !!!

शांत था मैं झील सा,
ख्वाब टूटते गए
उफान बढ़ता गया ।
पहाड़ था कठनाइयों का,
लोग हँसते गए,
मैं चढ़ता गया ।।

बांध था सब्र का मुझमे,
लोग आज़माते गए,
मैं टूटता गया ।
हुजूम था लोगो का इर्द-गिर्द,
जरुरत पड़ती गयी,
लोग मुकरते गए ।।

उफान था दर्द का अंदर,
मैं लिखता गया,
अल्फ़ाज़ मिलते गए ।
कुछ पूरे, तो कुछ अधूरे रहे,
मैं कहता गया,
कविता बनती गयी ।।

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किस्सा-कहानी !!!

कुछ शब्द है,
जो मेरी जुबानी है ।
न कोई किस्सा है,
न कोई कहानी है ।।

न कोई डाकू है,
न कोई राजा-रानी है ।
एक बूढी औरत है,
उसकी ही जिंदगानी है ।।

न शौहर है, न बेटा,
न बिटिया रानी है ।
चेहरे पर झुर्रियां है,
और आँखों में पानी है

न यादो का सहारा है,
न कोई निशानी है ।
आफताब, चांदनी बेरंग है,
अब तो जीना ही बेईमानी है ।।

न किसी से उम्मीद है
न किसी से परेशानी है ।
फिर भी थम न रही जिंदगी,
जाने किसकी मेहरबानी है ।।

न जाने कितनो की,
ऐसी ही जिंदगानी है ।
न खाने को खाना है,
न पीने को पानी है ।।

कुछ शब्द है ये,
जो मेरी जुबानी है ।
न कोई किस्सा है,
न कोई कहानी है ।।

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सैलाब…मन का

रूह के अपने इल्ज़ामो का,
आज मन में हिसाब चल रहा |
घनघोर सन्नाटो में भी,
मन में सैलाब चल रहा ||

बस सवाल उठ रहे,
ना कोई जवाब चल रहा |
हकीकत चल रही,
ना कोई ख्वाब चल रहा ||

पूछताछ चल रही खुद से,
ना तमाशा, ना कुछ बर्बाद चल रहा |
कुछ विन्नते, कुछ मुखबिरी,
तो कुछ फरियाद चल रहा ||

ना कुछ अच्छा,
ना कुछ खराब चल रहा |
कुछ भी तो नहीं ये,
खुद से खुद का हिसाब चल रहा ||

अपनी जिम्मेदारी, सपने और ख़ुशी,
सबपर सवाल जवाब चल रहा |
घनघोर सन्नाटो में भी,
मन में सैलाब चल रहा ||

Image : Google