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लुक्का-छिप्पी !!

खेल है जिंदगी ।
लुक्का छिप्पी का ।।

कई दर्द छिपे है,
मुस्कान के पीछे ।
किस्से छिपे है,
हर एक नाम के पीछे ।।

ख्वाहिशें छिपी है,
ईनाम के पीछे ।
जज्बात छिपे है,
हर जाम के पीछे ।।

खेल है जिंदगी ।
आँख मिचोली का ।।

मजबूरियाँ छिपी है,
हर काम के पीछे ।
स्वार्थ छिपा है,
हर सलाम के पीछे ।।

लालच छिपा है,
ईमान के पीछे ।
कई चेहरे छिपे है,
हर इंसान के पीछे ।।

खेल है जिंदगी ।
लुक्का छिप्पी का ।।

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आंसू हूँ मैं !

आंसू हूँ मैं,
आँखों का पानी नहीं हूँ !

ज़ज़्बात हूँ रूह की,
कोई दुखभरी कहानी नहीं हूँ ।
सुकून हूँ दर्द में,
कमज़ोरी की निशानी नहीं हूँ ।।

भावुकता हूँ दिल की,
भूचाल या सुनामी नहीं हूँ ।
ख़ुशी में भी शामिल हूँ,
बस दुःख की दीवानी नहीं हूँ ।।

आंसू हूँ मैं,
बस आँखों का पानी नहीं हूँ !

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बलात्कार….एक खेल !!

चलो एक खेल खेलते है !
मैं दर्द से चीखूंगी,
तुम मेरा मुँह दबा देना ।
मैं कह ना सकूँ किसी से,
मौत की नींद सुला देना ।
मैं अपनी इज़्ज़त हारूँगी,
तुम अपनी मर्दांनगी जीत लेना ।
मैं शरीर त्याग दूंगी,
तुम हवस की दीवानगी जीत लेना ।

चलो एक खेल खेलते है !
तू मेरी उम्र मत देखना,
और अपनी उम्र से मुँह मोड़ लेना ।
लूट ले मेरी इज़्ज़त मन भर पर,
और माँ-बहनो को छोड़ देना ।।
मन ना भरे जो तेरा तो,
हफ्तों – महीनो कैद कर लेना ।
नेता, पुलिस सबको मिला कर,
अपना काला मन सफ़ेद कर लेना ।।

चलो एक खेल खेलते है !
तू अकेला जीत जायेगा,
पूरी इंसानियत हार जाएगी ।
‘Candle march’ कर के,
दुनिया मुझे क्या ख़ाक न्याय दिलाएगी ।।
मेरी आपबीती पर,
कभी जरा गौर तू फरमाना ।
मेरे दर्द का बस एक हिस्सा,
अपनी बेटी को बताना ।।
जो किया तूने मेरे संग,
उनसब से उसे बचा लेना ।
या रब इतनी सी मिन्नत है की,
मुझे फिर कभी बेटी मत बनाना ।।

चलो एक खेल खेलते है !
तुम मेरा बलात्कार कर देना,
सारे मर्दो को शर्मसार कर देना ।
खुद के कर्मो पर गुमान कर लेना,
ले कर जान मेरी, तू अपना नाम कर लेना
चलो एक खेल खेलते है !

 

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मैं कवि हूँ !!!

ख़ुशी, दुःख, हँसी और आंसू
सबकुछ एक साथ लिखता हूँ
मुस्कान की चमक को दिन
जुल्फ के अंधेरो को रात लिखता हूँ
मैं कवि हूँ
लोगो के जज़्बात लिखता हूँ

शर्म से आँख झुकाना हो
कुछ कहने से घबराना हो
पहली नज़र, पहली मुस्कान से लेकर
हर एक मुलाकात लिखता हूँ
मैं कवि हूँ
मन की बात लिखता हूँ

मिलन का प्रेम हो
या विरह की पीड़ा
दिल धड़कना, घबराना
सब एक साथ लिखता हूँ
मैं कवि हूँ
इश्क़ के अल्फ़ाज़ लिखता हूँ

धर्म, समाज या राजनीति हो
तेज़ाब, दुष्कर्म, दहेज़ से
बेबस हमारे देश की बेटी हो
सब पर अपने ख्यालात लिखता हूँ
मैं कवि हूँ
कमज़ोर, बेबस की आवाज़ लिखता हूँ

लोगो की बेड़ियाँ तोड़ कर
विचार अपने आज़ाद लिखता हूँ
कल क्या हुआ, ना पता
क्या क्या होगा, क्या पता
मैं कवि हूँ
मैं बस और बस आज लिखता हूँ