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राख !!

वो लौटे इस कदर…

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सैलाब…मन का

रूह के अपने इल्ज़ामो का,
आज मन में हिसाब चल रहा |
घनघोर सन्नाटो में भी,
मन में सैलाब चल रहा ||

बस सवाल उठ रहे,
ना कोई जवाब चल रहा |
हकीकत चल रही,
ना कोई ख्वाब चल रहा ||

पूछताछ चल रही खुद से,
ना तमाशा, ना कुछ बर्बाद चल रहा |
कुछ विन्नते, कुछ मुखबिरी,
तो कुछ फरियाद चल रहा ||

ना कुछ अच्छा,
ना कुछ खराब चल रहा |
कुछ भी तो नहीं ये,
खुद से खुद का हिसाब चल रहा ||

अपनी जिम्मेदारी, सपने और ख़ुशी,
सबपर सवाल जवाब चल रहा |
घनघोर सन्नाटो में भी,
मन में सैलाब चल रहा ||

Image : Google

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लुक्का-छिप्पी !!

खेल है जिंदगी ।
लुक्का छिप्पी का ।।

कई दर्द छिपे है,
मुस्कान के पीछे ।
किस्से छिपे है,
हर एक नाम के पीछे ।।

ख्वाहिशें छिपी है,
ईनाम के पीछे ।
जज्बात छिपे है,
हर जाम के पीछे ।।

खेल है जिंदगी ।
आँख मिचोली का ।।

मजबूरियाँ छिपी है,
हर काम के पीछे ।
स्वार्थ छिपा है,
हर सलाम के पीछे ।।

लालच छिपा है,
ईमान के पीछे ।
कई चेहरे छिपे है,
हर इंसान के पीछे ।।

खेल है जिंदगी ।
लुक्का छिप्पी का ।।

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आंसू हूँ मैं !

आंसू हूँ मैं,
आँखों का पानी नहीं हूँ !

ज़ज़्बात हूँ रूह की,
कोई दुखभरी कहानी नहीं हूँ ।
सुकून हूँ दर्द में,
कमज़ोरी की निशानी नहीं हूँ ।।

भावुकता हूँ दिल की,
भूचाल या सुनामी नहीं हूँ ।
ख़ुशी में भी शामिल हूँ,
बस दुःख की दीवानी नहीं हूँ ।।

आंसू हूँ मैं,
बस आँखों का पानी नहीं हूँ !

Image Credit – Google