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Diversity & Inclusion

Thoda tu alag, Thoda main alag
Kehna ye kitna asan hai
Socha kbhi, Ek hai hum ?
Kyunki Pahle hum insan hai

Rang alag, dharm alag
Alag apna makan hai
Sarhadien kheechi hai zameen par
Par sabka ek ashman hai

Umar alag, soch alag
Alag sabka mukam hai
Raste alag, humsafar alag
Par manzil sabki masaan hai

Tujhse nhi, mujhse nhi
“Humse” ye jahaan hai
Laakh alag par ek hai hum
Kyunki pahle hum insan hai

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बातें !!!

बातें !
कितनी अजीब होती है,
हसांती है,
रुलाती है,
बुरी लग जाये तो,
लोगो के मुँह फुलाती है !!

बातें !
कितनी हसीन होती है,
दुःखों में तो रुला जाती है,
ख़ुशी में नचा जाती है,
वक़्त पर कह दो, कई दफा,
कई रिश्ते बचा जाती है ।।

बातें !
कितनी दमदार होती है,
ख़ुशी को बढ़ा देती है,
गम को बाँट देती है,
दिल से करो गर किसी से,
मिलो की दूरी पाट देती है ।।

बातें !
कितनी खतरनाक होती है,
कुछ को बदनामी देती है,
घायल कर रूह को, निशानी देती है,
कहने को तो सिर्फ कुछ बात है,
पर जिंदगी भर की कहानी देती है ।।

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रंग !!

हर तरफ “इश्क़” में रंगा आसमान होगा ।
वो मुझमे थी , और उसमे सारा “जहान” होगा ।

Har taraf “ISHQ” me ranga asman hoga

wo mujhme thi aur usme sara “Jahan” hoga

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जिंदगी……एक सच !!!

उम्र क पड़ाव पर,
इस कदर चलते गए ।
कदमो में ज़ख्म थे,
पर आगे बढ़ते गए ।।

‘हम’ और ‘समाज’ ,
इस कदर लड़ते गए ।
समाज दोष देता रहा,
‘हम’ बदलते गए ।।

नाकामयाबियों की कसक,
इस कदर पलती गयी ।
स्वाभिमान की आग थी,
और रूह जलती गयी ।।

हर शाम जिंदगी के पन्ने,
इस कदर लिखते गए ।
जरुरत जीतती रही और,
शौक बिकते गए ।।

जीने की कोशिश ।
इस कदर करते गए ।
जिन्दा, तो क्या पता,
हर रोज़, कई दफा मरते गए ।।

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कभी-कभी ।।

यूँ तो खामोश हूँ,
पर कुछ बात उमड़ती है ।
कभी-कभी ।।

सो जाता हूँ अक्सर,
बिन सोये कुछ रात गुजरती है ।
कभी-कभी ।।

पता है तुम्हे,चमक है तुम में ।
जो मेरे आँखों में चमकती है,
कभी-कभी ।।

एक खुशबू है तुम में ।
जो मेरी रूह में महकती है,
कभी-कभी ।।

कुछ बात है तुम में ।
जो मेरी ख़यालात से मिलती है,
कभी-कभी ।।

बंजारन हो तुम ।
जो मेरे मन में भटकती है,
कभी-कभी ।।

दीपक की ज्योति हो तुम ।
जो अँधेरा भगाती है मेरा,
कभी-कभी ।।

परी हो तुम ।
जो मेरे सपनो में उड़ती हो,
कभी-कभी ।।

वैसे तो ज़ज्बात बहुत है ।
पर अब लिखता हूँ बस,
कभी-कभी ।।

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अलग हूँ थोड़ा !!

अलग हूँ थोड़ा,
हँसता हूँ, मुस्कुराता हूँ ।
झूठ नहीं बोलता,
बस कुछ बातें छुपाता हूँ ।।

मजबूत हूँ वैसे,
कभी कभी कमजोर पड़ जाता हूँ ।
रोता नहीं हूँ,
खामोश हो जाता हूँ ।।

अलग हूँ थोड़ा,
हँसता हूँ, मुस्कुराता हूँ ।
रोशन करने को सारा जहां,
खुद के अरमान जलाता हूँ ।।

निडर हूँ मैं,
कभी कभी सिहर जाता हूँ।
टूटता नहीं कभी,
बस थोड़ा सा बिखर जाता हूँ ।।

अलग हूँ थोड़ा,
हँसता हूँ, मुस्कुराता हूँ ।
झूठ नहीं बोलता,
बस कुछ बातें छुपाता हूँ ।।

Image Credit – Google

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सैलाब…मन का

रूह के अपने इल्ज़ामो का,
आज मन में हिसाब चल रहा |
घनघोर सन्नाटो में भी,
मन में सैलाब चल रहा ||

बस सवाल उठ रहे,
ना कोई जवाब चल रहा |
हकीकत चल रही,
ना कोई ख्वाब चल रहा ||

पूछताछ चल रही खुद से,
ना तमाशा, ना कुछ बर्बाद चल रहा |
कुछ विन्नते, कुछ मुखबिरी,
तो कुछ फरियाद चल रहा ||

ना कुछ अच्छा,
ना कुछ खराब चल रहा |
कुछ भी तो नहीं ये,
खुद से खुद का हिसाब चल रहा ||

अपनी जिम्मेदारी, सपने और ख़ुशी,
सबपर सवाल जवाब चल रहा |
घनघोर सन्नाटो में भी,
मन में सैलाब चल रहा ||

Image : Google

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लुक्का-छिप्पी !!

खेल है जिंदगी ।
लुक्का छिप्पी का ।।

कई दर्द छिपे है,
मुस्कान के पीछे ।
किस्से छिपे है,
हर एक नाम के पीछे ।।

ख्वाहिशें छिपी है,
ईनाम के पीछे ।
जज्बात छिपे है,
हर जाम के पीछे ।।

खेल है जिंदगी ।
आँख मिचोली का ।।

मजबूरियाँ छिपी है,
हर काम के पीछे ।
स्वार्थ छिपा है,
हर सलाम के पीछे ।।

लालच छिपा है,
ईमान के पीछे ।
कई चेहरे छिपे है,
हर इंसान के पीछे ।।

खेल है जिंदगी ।
लुक्का छिप्पी का ।।

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ख़ामोशी…एक चीख

एक अर्सा बीत गया था,
एक-दूसरे को कुछ बताये हुए |
बेख़ौफ़ नज़रे मिलाये हुए,
एक साथ मुस्कुराये हुए ||
कुछ गांठे पड़ गयी थी,
मन में बातें छुपाये हुए |
ग़लतफ़हमी बिन सुलझाए हुए,
हालत को दोषी बनाये हुए ||

फिर वो दोनों साथ बैठे है,
खुद को खुश दिखाए हुए  |
कुछ न हुआ ये जताये हुए,
अंदर के तूफान को छुपाये हुए ||
रूह के सवालो को दबाये हुए,
मन के शोर को खामोश कराये हुए |
सब कुछ अच्छा बताये हुए,
चेहरे पे मुस्कान चिपकाये हुए ||

फिर वो दोनों साथ बैठे है,
खुद को खुश दिखाए हुए |
सब कुछ अच्छा बताये हुए,
चेहरे पे मुस्कान चिपकाये हुए ||