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दूर तक जाना है !!

कुछ पाया है, कुछ अभी पाना है,
आँखों में ख्वाब है, ख्वाहिशो का ठिकाना है ।
लड़खड़ा जाये कदम तो, डरना नहीं ,
एक सफर है ये, बहुत दूर तक जाना है ।।

हौसलों का साधन है, अरमानो का आशियाना है,
कुछ सीख है, कुछ जिंदगी का अफसाना है ।
रुका हूँ कुछ पल, जिंदगी का लुत्फ़ उठाने को,
थका नहीं हूँ, अभी तो जीतने को जमाना है । ।

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रंग !!

हर तरफ “इश्क़” में रंगा आसमान होगा ।
वो मुझमे थी , और उसमे सारा “जहान” होगा ।

Har taraf “ISHQ” me ranga asman hoga

wo mujhme thi aur usme sara “Jahan” hoga

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वक़्त !

अपने पल खुद से चुरा रहा हूँ ,
अँधेरे में बैठ कर मुस्कुरा रहा हूँ ।
कभी फिर आ कर आज़मा लेना ए-वक़्त,
बदला नहीं हूँ, बस खुद को छुपा रहा हूँ ।।

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जिंदगी……एक सच !!!

उम्र क पड़ाव पर,
इस कदर चलते गए ।
कदमो में ज़ख्म थे,
पर आगे बढ़ते गए ।।

‘हम’ और ‘समाज’ ,
इस कदर लड़ते गए ।
समाज दोष देता रहा,
‘हम’ बदलते गए ।।

नाकामयाबियों की कसक,
इस कदर पलती गयी ।
स्वाभिमान की आग थी,
और रूह जलती गयी ।।

हर शाम जिंदगी के पन्ने,
इस कदर लिखते गए ।
जरुरत जीतती रही और,
शौक बिकते गए ।।

जीने की कोशिश ।
इस कदर करते गए ।
जिन्दा, तो क्या पता,
हर रोज़, कई दफा मरते गए ।।

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अबला नारी नहीं !!!

अबला नारी नहीं,
विराज हूँ मैं ।
खुली किताब नहीं,
गहरी राज़ हूँ मैं ।।
बस एक जिस्म नहीं,
बुलंद आवाज़ हूँ मैं ।
एक दो पल नहीं,
पूरी की पूरी आज हूँ मैं ।।

फूल सी सुकुमारी नहीं,
बदलाव का आगाज़ हूँ मैं ।
बस कोमल,दयालु और सहनशील नहीं,
दुनिया का हर एक जज़्बात हूँ मैं ।।
रंग रूप से ही नहीं,
दिलो से भी मुमताज़ हूँ मैं ।
अबला नारी नहीं
भूत, भविष्य, आज हूँ मैं ।।

धुल नहीं कदमो की,
मुकुट और सरताज हूँ मैं ।
अबला नारी नहीं,
ब्रम्हांड, दुनिया और समाज हूँ मैं ।।
अबला नारी नहीं मैं
दिये की आग हूँ मैं ।
कुछ एक शब्द नहीं,
सरगम और राग हूँ मैं ।।
बस अबला नारी नहीं मैं ।
घरो का चिराग हूँ मैं ।।

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अलग हूँ थोड़ा !!

अलग हूँ थोड़ा,
हँसता हूँ, मुस्कुराता हूँ ।
झूठ नहीं बोलता,
बस कुछ बातें छुपाता हूँ ।।

मजबूत हूँ वैसे,
कभी कभी कमजोर पड़ जाता हूँ ।
रोता नहीं हूँ,
खामोश हो जाता हूँ ।।

अलग हूँ थोड़ा,
हँसता हूँ, मुस्कुराता हूँ ।
रोशन करने को सारा जहां,
खुद के अरमान जलाता हूँ ।।

निडर हूँ मैं,
कभी कभी सिहर जाता हूँ।
टूटता नहीं कभी,
बस थोड़ा सा बिखर जाता हूँ ।।

अलग हूँ थोड़ा,
हँसता हूँ, मुस्कुराता हूँ ।
झूठ नहीं बोलता,
बस कुछ बातें छुपाता हूँ ।।

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एक जानवर …..इंसान !

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

जो कमाता है,
और भूखे भी खुद मर जाता है ।
कपडे पहनता है,
और फाड़ कर, इज़्ज़त भी लूट जाता है ।।

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

रिश्ते रखता है,
और उन्हें ही, शर्मशार कर जाता है।
खुद के उगाये अन्न में,
खुद ही ज़हर मिलता है।।

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

जाति-धर्म के नाम पर,
हर पल रक्त बहता है।
मारने को खुद को,
तरह-तरह के हथियार बनता है।।

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

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