Posted in Emotions, Hindi, Love, Personal, Poetry

कभी-कभी ।।

यूँ तो खामोश हूँ,
पर कुछ बात उमड़ती है ।
कभी-कभी ।।

सो जाता हूँ अक्सर,
बिन सोये कुछ रात गुजरती है ।
कभी-कभी ।।

पता है तुम्हे,चमक है तुम में ।
जो मेरे आँखों में चमकती है,
कभी-कभी ।।

एक खुशबू है तुम में ।
जो मेरी रूह में महकती है,
कभी-कभी ।।

कुछ बात है तुम में ।
जो मेरी ख़यालात से मिलती है,
कभी-कभी ।।

बंजारन हो तुम ।
जो मेरे मन में भटकती है,
कभी-कभी ।।

दीपक की ज्योति हो तुम ।
जो अँधेरा भगाती है मेरा,
कभी-कभी ।।

परी हो तुम ।
जो मेरे सपनो में उड़ती हो,
कभी-कभी ।।

वैसे तो ज़ज्बात बहुत है ।
पर अब लिखता हूँ बस,
कभी-कभी ।।

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अनकहे अल्फ़ाज़ !!!

मन में कोई हिचक नहीं,
जाओ दिल की बात कह दो |
घुमा-फिरा के चंद शब्द नहीं,
इत्मीनान से पूरी किताब कह दो ||
डर डर के कुछ झूठ नहीं,
सच्चे दिल के अल्फ़ाज़ कह दो |
रूठने, छूटने का गम नहीं,
खुद में छुपी हर बात कह दो ||

छोड़ के अपने अहम् को,
जाओ दिल के जज़्बात कह दो |
तोड़ के वक़्त की पाबन्दी,
हर दिन,हर पहर, हर रात कह दो ||
दूर जाने के पहले किसी के,
अपने मन के हर एक एहसास कह दो |
घुट-घुट के क्यों जीना है,
खुद के विचारो को आज़ाद कह दो ||

छोड़ 4 लोगो की चिंता को,
जाओ, दिल की बात कह दो |
होठ की सारी मुस्कुराहट और,
आँखों की सारी बरसात कह दो ||
जाओ,उठो, आज और अभी
प्यार माफ़ी या कोई ग़लतफ़हमी |
छोड़ डर, खौफ और घबराहट को
मुस्कुराओ, और दिल की बात कह दो ||

निकाल के सारे जज़्बात को,
रिश्ते, मन सब साफ़ कर दो |
जाओ, सब कुछ माफ़ कर दो,
आज, कल और परसो नहीं
अभी , इसी वक़्त और
एक साथ कह दो ||
मन में और कोई हिचक नहीं ,
जाओ सब कुछ साफ़ कह दो |
दिल क ज़ज़्बात और
मन के सारे अल्फ़ाज़ कह दो ||

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गुनाह !!!

हाँ, मैंने चोरी की !!!
पर खुद क लिए नहीं,
उसके लिए की |
जो अपना सबकुछ,
हँस के दुसरो को दे देती है ||
जो सबके हर तकलीफ,
हँस के सुन लेती है |
जो अपने सारे गम,
चुपचाप सह लेती है ||

हाँ, मैंने चोरी की !!!
चुराया मैंने,
अपने जिंदगी से
कुछ लम्हे |
बस उसके लिए ||
उन लम्हो में ,
मैं उसे हँसाऊँगा |
उसे उसकेहोने का,
एहसास दिलायूँगा ||

हाँ, मैंने चोरी की !!!
बस और बस उसके लिए,
और अगर इस गुनाह
की सजा मौत है |
तो जनाब !!!
नहीं डरता मैं मौत से ||

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लम्हे !!

मीलो की दूरी थी,
मुलाकातें भी अधूरी थी |
तेरे होने का एहसास था,
तेरा हर लम्हा मेरे पास था ||

दूरी तो कम हो गयी,
कुछ एक मुलाकातें भी हों गयी |
न जाने क्यों सबकुछ खो गया,
तूने  पराया किया ही, अब वो लम्हा भी पराया हो गया ||

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ओझल नज़रे !!

तो क्या जो अब जुबान हर
शब्द पर लड़खड़ाया करती है
मेरे सफ़ेद बाल
मेरी उम्र बयां करती है

तो क्या ये आंसू पोछने वाले
हाथ हर वक़्त कांपते है
थोड़ा भी चल लेने पर
मेरे फेफड़े हाँफते है

फिर भी ओझल नज़रो से
तेरा चेहरा साफ़ दिखाई देता है
पापा तुम सठिया गए
ऐसा हमारा बेटा कहता है

कहता मेरी हरकतों से
उसका परिवार बेहाल हो गया है
झूठ बोलता है की तुझे दुनिया से
गए हुए कई साल हो गया है

अभी सुबह नाश्ते पे तो तुम
मेरे साथ ही बैठी थी
मुझे अकेला नहीं छोड़ोगी
ऐसा दिनों रात कहती थी

अपना दर्द मैं किसी से
कह नहीं पता हूँ
दो बातें किसी से करने को
दिन रात तरस जाता हूँ

मुझे भी हमेशा के लिए
सुला दो ना
खुद आ जाओ या फिर
मुझे वहां बुला लो ना

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अच्छा सुनो !

अच्छा सुनो !
ये जो “Forever” शब्द,
के साथ कार्ड दी थी |
उसे फाड़ दू, जला दू ?
या फिर सारी बातें
past में बना दू ?

अच्छा सुनो !
ये जो तुम कांच की,
dancing couple दी थी |
उन्हें तोड़ दू, कहीं झोक दू ?
या फिर उनको
वही रोक दू ?

अच्छा सुनो !
वो जो फूल बना,
रुमाल छूटा था मेरे पास |
उसे तुम्हे लौटा दू ?
या फिर टूटे वादों के
आंसू उसमे ही बहा दू ?

अच्छा सुनो !
वो जो कविताये,
लिखी थी तुमपर |
उसके हर लफ्ज़ मिटा दू ?
या फिर अब उनसब को
इस ज़माने को दिखा दू ?

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मोहब्बत !!

कैसी है ये मोहब्बत,
जिससे दामन तुम बचा जाते |

बस अपने ही ख्यालो से,
तुम दिनों रात जगा जाते ||

ना बरसा था बादल फिर भी,
तुम सबकुछ यूँ भीगा जाते |

बिन छुवे तुम पर्वत को,
उसकी बर्फ पिघला जाते ||

जो नैन-नक्ष तेरे तीखे थे,
पूरी नदियाँ घुमा जाते |

चुप थे तेरे लब्ब फिर भी,
नैना तेरे सब बता जाते ||

कैसी है ये मोहब्बत,
जिससे दामन तुम बचा जाते |

बस अपने ही ख्यालो से,
तुम दिनों रात जगा जाते ||

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परछाईं !!

मेरी एक परछाईं थी ||
जब आया मैं दुनिया में,
मेरे साथ वो आयी थी |
ना ही कोई रूप था उसका,
ना ही कोई रंग लायी थी |
मेरी एक परछाईं थी ||

ना ही कोई गुरुर उसे,
खुद पर ना कभी इतरायी थी |
ना जलती थी धूप में वो,
रात से ना वो घबराई थी |
मेरी एक परछाईं थी ||

ना ही उसके नखरे थे,
ना ही कोई लड़ाई थी |
थी झील सी शांत वो,
समुंद्र सी उसकी गहराई थी |
मेरी एक परछाईं थी ||

मुझमे कुछ भी अच्छा हो,
या फिर कोई बुराई थी |
भूल के सारे तथ्यों को वो,
मेरा साथ निभाई थी |
मेरी एक परछाईं थी ||

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एक हसीना !!

भूखा हूँ तेरे कुछ लफ्ज़ का,
प्यासी है नज़रे तेरी एक झलक को |
बिन तुझे देखे, ना मैं इफ्तार करूँगा ||

माना की तू हसीन, ईद के चाँद सी,
पर एक दफा निकल तू |
खुद की आँखों में, तुझे गिरफ्तार करूँगा ||

बंद कर लूंगा तुझे मैं,
दिल की बोतल में इस कदर |
जब जी चाहे तो, तेरा दीदार करूँगा ||

तू खुद पूछेगी मुझसे,
“ऐसी क्या खूबी है मुझमे” |
इतना टूट कर तुझे मैं प्यार करूँगा ||