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परछाईं !!

मेरी एक परछाईं थी ||
जब आया मैं दुनिया में,
मेरे साथ वो आयी थी |
ना ही कोई रूप था उसका,
ना ही कोई रंग लायी थी |
मेरी एक परछाईं थी ||

ना ही कोई गुरुर उसे,
खुद पर ना कभी इतरायी थी |
ना जलती थी धूप में वो,
रात से ना वो घबराई थी |
मेरी एक परछाईं थी ||

ना ही उसके नखरे थे,
ना ही कोई लड़ाई थी |
थी झील सी शांत वो,
समुंद्र सी उसकी गहराई थी |
मेरी एक परछाईं थी ||

मुझमे कुछ भी अच्छा हो,
या फिर कोई बुराई थी |
भूल के सारे तथ्यों को वो,
मेरा साथ निभाई थी |
मेरी एक परछाईं थी ||

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मुद्दत !!

न जाने एक अरसे से क्यों,
धोखा ना मिला |

कोई अपना ना रहा या फिर,
उन्हें मौका ना मिला ||

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एक हसीना !!

भूखा हूँ तेरे कुछ लफ्ज़ का,
प्यासी है नज़रे तेरी एक झलक को |
बिन तुझे देखे, ना मैं इफ्तार करूँगा ||

माना की तू हसीन, ईद के चाँद सी,
पर एक दफा निकल तू |
खुद की आँखों में, तुझे गिरफ्तार करूँगा ||

बंद कर लूंगा तुझे मैं,
दिल की बोतल में इस कदर |
जब जी चाहे तो, तेरा दीदार करूँगा ||

तू खुद पूछेगी मुझसे,
“ऐसी क्या खूबी है मुझमे” |
इतना टूट कर तुझे मैं प्यार करूँगा ||

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तड़प !!

तरस गयी हूँ, घूमने के लिए,
बारिश में भीगने के लिए |

एक चाय का प्याला पीने के लिए,
कुछ पल उनके साथ जीने के लिए ||

उनकी आँखो में खोने के लिए,
कंधे पर सिर रख रोने के लिए |

तरस गए हम वक़्त पाने के लिए,
उनके मन के ज़ज्बात जानने के लिए ||

तरस गए है, उनसे प्यार जताने के लिए,
वो मेरे है, इस ख़ुशी पर इतराने के लिए |

प्यार के एहसास महसूस करने के लिए,
छोटी-छोटी बातों पर मोहब्बत से लड़ने के लिए ||

प्यार से उनको कुछ खत लिखने के लिए,
खत पढ़ कर,उनके अल्फ़ाज़ सुनाने के लिए |

पर उनके पास मेरे लिए वक़्त कहाँ है,
खुश है वहीं, वो अब जहाँ है ||

उसके लिए भी तो बादल बरसता होगा,
भीगने के लिए वो भी तरसता होगा ||

उसे भी तो कुछ बताना होगा ना,
शायद मुझसे प्यार जाताना होगा ना |

हकीकत ना सही ये सब,
सपने पुरे ख्वाब में करेंगे|
मिलने दो कभी,
हर एक तड़प हिसाब में करेंगे ||

Idea Credit & Original poem – “RITIKA”.  Modified by – “ROHIT”

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Love & Pen…

जब तक मृग जैसे नैन तेरे,
और गर्दन तेरी सुराही है |
तब तक हम लिखेंगे ||

जब तक मैं हूँ साथ तेरे,
और तू मेरी हमराही है |
तब तक हम लिखेंगे ||

जब तक तू है किताब मेरी,
और तेरी आँखें मेरी पढाई है |
तब तक हम लिखेंगे ||

जब तक दिल में है प्यार मेरे,
और कलम में स्याही है |
तब तक हम लिखेंगे ||

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इश्क़ !!

बता दे पता अपनी गली का
बिन देखे तुझे,अब गुजारा नहीं होता

खोया रहता हूँ दिन-ओ-रात तुझमे
होश हमें अब, हमारा नहीं होता

जानता हूँ, तेरा देख कर मुस्कुराना
इश्क़ का इशारा नहीं होता

जो समझ जाता दिल ये बात तो
मैं आशिक़ तुम्हारा नहीं होता

बता दे पता अपनी गली का
बिन देखे तुझे,अब गुजारा नहीं होता

जो होती खबर, तेरी दर की तो
शहरो में, मैं आवारा नहीं होता

होता पानी फिर भी नैन में,
पर दुःख से, वो खारा नहीं होता

तेरी एक झलक मिल जाती तो
इश्क़ में, दिल बेसहारा नहीं होता

बता दे पता अपनी गली का
बिन देखे तुझे,अब गुजारा नहीं होता