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अब मैं…..!!!

डगमगा रहे है कदम,
पर लड़खड़ाता नहीं हूँ ।
टूटता हूँ मैं रोज़,
पर चिल्लाता नहीं हूँ ।।

बहुत कश्मकश है रूह की,
चुप हो जाता हूँ, बताता नहीं हूँ ।
ऐसा होता, वैसा होता सब सोचता हूँ,
अपने फैसलों पर पछताता नहीं हूँ ।।

डर तो आज भी बहुत लगता है,
पर अब मैं घबराता नहीं हूँ ।
शिकायतें तो मुझे भी बहुत है ,
मगर हर बात मैं जताता नहीं हूँ ।।

माफ़ कर देता हूँ हर शख्श को पर,
बुरा क्या लगा, ये भुलाता नहीं हूँ ।
थक गयी है आँखें, सारे फरेब देख कर,
बस बंद करता हूँ,कभी आँखों को सुलाता नहीं हूँ ।।

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जिंदगी……एक सच !!!

उम्र क पड़ाव पर,
इस कदर चलते गए ।
कदमो में ज़ख्म थे,
पर आगे बढ़ते गए ।।

‘हम’ और ‘समाज’ ,
इस कदर लड़ते गए ।
समाज दोष देता रहा,
‘हम’ बदलते गए ।।

नाकामयाबियों की कसक,
इस कदर पलती गयी ।
स्वाभिमान की आग थी,
और रूह जलती गयी ।।

हर शाम जिंदगी के पन्ने,
इस कदर लिखते गए ।
जरुरत जीतती रही और,
शौक बिकते गए ।।

जीने की कोशिश ।
इस कदर करते गए ।
जिन्दा, तो क्या पता,
हर रोज़, कई दफा मरते गए ।।

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आंसू हूँ मैं !

आंसू हूँ मैं,
आँखों का पानी नहीं हूँ !

ज़ज़्बात हूँ रूह की,
कोई दुखभरी कहानी नहीं हूँ ।
सुकून हूँ दर्द में,
कमज़ोरी की निशानी नहीं हूँ ।।

भावुकता हूँ दिल की,
भूचाल या सुनामी नहीं हूँ ।
ख़ुशी में भी शामिल हूँ,
बस दुःख की दीवानी नहीं हूँ ।।

आंसू हूँ मैं,
बस आँखों का पानी नहीं हूँ !

Image Credit – Google

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ख़ामोशी…एक चीख

एक अर्सा बीत गया था,
एक-दूसरे को कुछ बताये हुए |
बेख़ौफ़ नज़रे मिलाये हुए,
एक साथ मुस्कुराये हुए ||
कुछ गांठे पड़ गयी थी,
मन में बातें छुपाये हुए |
ग़लतफ़हमी बिन सुलझाए हुए,
हालत को दोषी बनाये हुए ||

फिर वो दोनों साथ बैठे है,
खुद को खुश दिखाए हुए  |
कुछ न हुआ ये जताये हुए,
अंदर के तूफान को छुपाये हुए ||
रूह के सवालो को दबाये हुए,
मन के शोर को खामोश कराये हुए |
सब कुछ अच्छा बताये हुए,
चेहरे पे मुस्कान चिपकाये हुए ||

फिर वो दोनों साथ बैठे है,
खुद को खुश दिखाए हुए |
सब कुछ अच्छा बताये हुए,
चेहरे पे मुस्कान चिपकाये हुए ||

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लम्हे !!

मीलो की दूरी थी,
मुलाकातें भी अधूरी थी |
तेरे होने का एहसास था,
तेरा हर लम्हा मेरे पास था ||

दूरी तो कम हो गयी,
कुछ एक मुलाकातें भी हों गयी |
न जाने क्यों सबकुछ खो गया,
तूने  पराया किया ही, अब वो लम्हा भी पराया हो गया ||

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अच्छा सुनो !

अच्छा सुनो !
ये जो “Forever” शब्द,
के साथ कार्ड दी थी |
उसे फाड़ दू, जला दू ?
या फिर सारी बातें
past में बना दू ?

अच्छा सुनो !
ये जो तुम कांच की,
dancing couple दी थी |
उन्हें तोड़ दू, कहीं झोक दू ?
या फिर उनको
वही रोक दू ?

अच्छा सुनो !
वो जो फूल बना,
रुमाल छूटा था मेरे पास |
उसे तुम्हे लौटा दू ?
या फिर टूटे वादों के
आंसू उसमे ही बहा दू ?

अच्छा सुनो !
वो जो कविताये,
लिखी थी तुमपर |
उसके हर लफ्ज़ मिटा दू ?
या फिर अब उनसब को
इस ज़माने को दिखा दू ?