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अब मैं…..!!!

डगमगा रहे है कदम,
पर लड़खड़ाता नहीं हूँ ।
टूटता हूँ मैं रोज़,
पर चिल्लाता नहीं हूँ ।।

बहुत कश्मकश है रूह की,
चुप हो जाता हूँ, बताता नहीं हूँ ।
ऐसा होता, वैसा होता सब सोचता हूँ,
अपने फैसलों पर पछताता नहीं हूँ ।।

डर तो आज भी बहुत लगता है,
पर अब मैं घबराता नहीं हूँ ।
शिकायतें तो मुझे भी बहुत है ,
मगर हर बात मैं जताता नहीं हूँ ।।

माफ़ कर देता हूँ हर शख्श को पर,
बुरा क्या लगा, ये भुलाता नहीं हूँ ।
थक गयी है आँखें, सारे फरेब देख कर,
बस बंद करता हूँ,कभी आँखों को सुलाता नहीं हूँ ।।

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अबला नारी नहीं !!!

अबला नारी नहीं,
विराज हूँ मैं ।
खुली किताब नहीं,
गहरी राज़ हूँ मैं ।।
बस एक जिस्म नहीं,
बुलंद आवाज़ हूँ मैं ।
एक दो पल नहीं,
पूरी की पूरी आज हूँ मैं ।।

फूल सी सुकुमारी नहीं,
बदलाव का आगाज़ हूँ मैं ।
बस कोमल,दयालु और सहनशील नहीं,
दुनिया का हर एक जज़्बात हूँ मैं ।।
रंग रूप से ही नहीं,
दिलो से भी मुमताज़ हूँ मैं ।
अबला नारी नहीं
भूत, भविष्य, आज हूँ मैं ।।

धुल नहीं कदमो की,
मुकुट और सरताज हूँ मैं ।
अबला नारी नहीं,
ब्रम्हांड, दुनिया और समाज हूँ मैं ।।
अबला नारी नहीं मैं
दिये की आग हूँ मैं ।
कुछ एक शब्द नहीं,
सरगम और राग हूँ मैं ।।
बस अबला नारी नहीं मैं ।
घरो का चिराग हूँ मैं ।।

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एक जानवर …..इंसान !

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

जो कमाता है,
और भूखे भी खुद मर जाता है ।
कपडे पहनता है,
और फाड़ कर, इज़्ज़त भी लूट जाता है ।।

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

रिश्ते रखता है,
और उन्हें ही, शर्मशार कर जाता है।
खुद के उगाये अन्न में,
खुद ही ज़हर मिलता है।।

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

जाति-धर्म के नाम पर,
हर पल रक्त बहता है।
मारने को खुद को,
तरह-तरह के हथियार बनता है।।

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

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किस्सा-कहानी !!!

कुछ शब्द है,
जो मेरी जुबानी है ।
न कोई किस्सा है,
न कोई कहानी है ।।

न कोई डाकू है,
न कोई राजा-रानी है ।
एक बूढी औरत है,
उसकी ही जिंदगानी है ।।

न शौहर है, न बेटा,
न बिटिया रानी है ।
चेहरे पर झुर्रियां है,
और आँखों में पानी है

न यादो का सहारा है,
न कोई निशानी है ।
आफताब, चांदनी बेरंग है,
अब तो जीना ही बेईमानी है ।।

न किसी से उम्मीद है
न किसी से परेशानी है ।
फिर भी थम न रही जिंदगी,
जाने किसकी मेहरबानी है ।।

न जाने कितनो की,
ऐसी ही जिंदगानी है ।
न खाने को खाना है,
न पीने को पानी है ।।

कुछ शब्द है ये,
जो मेरी जुबानी है ।
न कोई किस्सा है,
न कोई कहानी है ।।

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लुक्का-छिप्पी !!

खेल है जिंदगी ।
लुक्का छिप्पी का ।।

कई दर्द छिपे है,
मुस्कान के पीछे ।
किस्से छिपे है,
हर एक नाम के पीछे ।।

ख्वाहिशें छिपी है,
ईनाम के पीछे ।
जज्बात छिपे है,
हर जाम के पीछे ।।

खेल है जिंदगी ।
आँख मिचोली का ।।

मजबूरियाँ छिपी है,
हर काम के पीछे ।
स्वार्थ छिपा है,
हर सलाम के पीछे ।।

लालच छिपा है,
ईमान के पीछे ।
कई चेहरे छिपे है,
हर इंसान के पीछे ।।

खेल है जिंदगी ।
लुक्का छिप्पी का ।।

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बलात्कार….एक खेल !!

चलो एक खेल खेलते है !
मैं दर्द से चीखूंगी,
तुम मेरा मुँह दबा देना ।
मैं कह ना सकूँ किसी से,
मौत की नींद सुला देना ।
मैं अपनी इज़्ज़त हारूँगी,
तुम अपनी मर्दांनगी जीत लेना ।
मैं शरीर त्याग दूंगी,
तुम हवस की दीवानगी जीत लेना ।

चलो एक खेल खेलते है !
तू मेरी उम्र मत देखना,
और अपनी उम्र से मुँह मोड़ लेना ।
लूट ले मेरी इज़्ज़त मन भर पर,
और माँ-बहनो को छोड़ देना ।।
मन ना भरे जो तेरा तो,
हफ्तों – महीनो कैद कर लेना ।
नेता, पुलिस सबको मिला कर,
अपना काला मन सफ़ेद कर लेना ।।

चलो एक खेल खेलते है !
तू अकेला जीत जायेगा,
पूरी इंसानियत हार जाएगी ।
‘Candle march’ कर के,
दुनिया मुझे क्या ख़ाक न्याय दिलाएगी ।।
मेरी आपबीती पर,
कभी जरा गौर तू फरमाना ।
मेरे दर्द का बस एक हिस्सा,
अपनी बेटी को बताना ।।
जो किया तूने मेरे संग,
उनसब से उसे बचा लेना ।
या रब इतनी सी मिन्नत है की,
मुझे फिर कभी बेटी मत बनाना ।।

चलो एक खेल खेलते है !
तुम मेरा बलात्कार कर देना,
सारे मर्दो को शर्मसार कर देना ।
खुद के कर्मो पर गुमान कर लेना,
ले कर जान मेरी, तू अपना नाम कर लेना
चलो एक खेल खेलते है !

 

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