Posted in Emotions, Fiction, Hindi, Poetry

ओझल नज़रे !!

तो क्या जो अब जुबान हर
शब्द पर लड़खड़ाया करती है
मेरे सफ़ेद बाल
मेरी उम्र बयां करती है

तो क्या ये आंसू पोछने वाले
हाथ हर वक़्त कांपते है
थोड़ा भी चल लेने पर
मेरे फेफड़े हाँफते है

फिर भी ओझल नज़रो से
तेरा चेहरा साफ़ दिखाई देता है
पापा तुम सठिया गए
ऐसा हमारा बेटा कहता है

कहता मेरी हरकतों से
उसका परिवार बेहाल हो गया है
झूठ बोलता है की तुझे दुनिया से
गए हुए कई साल हो गया है

अभी सुबह नाश्ते पे तो तुम
मेरे साथ ही बैठी थी
मुझे अकेला नहीं छोड़ोगी
ऐसा दिनों रात कहती थी

अपना दर्द मैं किसी से
कह नहीं पता हूँ
दो बातें किसी से करने को
दिन रात तरस जाता हूँ

मुझे भी हमेशा के लिए
सुला दो ना
खुद आ जाओ या फिर
मुझे वहां बुला लो ना

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Author:

Not organized, But you will not find it messy. Not punctual, But will be there at right Time. Not supportive, But will be there, when needed. Not a writer, But you will find this interesting.

33 thoughts on “ओझल नज़रे !!

  1. Kya khub Kaha gaya hai ki “aksar wahi diye haathon ko jala dete hai, jinhe hum Hawa se bacha rahe hote hai” Separation is the brutal truth and aging is the sad reality. You fantastically covered both the aspects. Hats off sir. Amazing job yet again. 👏👏😊

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