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ख़ामोशी…एक चीख

एक अर्सा बीत गया था,
एक-दूसरे को कुछ बताये हुए |
बेख़ौफ़ नज़रे मिलाये हुए,
एक साथ मुस्कुराये हुए ||
कुछ गांठे पड़ गयी थी,
मन में बातें छुपाये हुए |
ग़लतफ़हमी बिन सुलझाए हुए,
हालत को दोषी बनाये हुए ||

फिर वो दोनों साथ बैठे है,
खुद को खुश दिखाए हुए  |
कुछ न हुआ ये जताये हुए,
अंदर के तूफान को छुपाये हुए ||
रूह के सवालो को दबाये हुए,
मन के शोर को खामोश कराये हुए |
सब कुछ अच्छा बताये हुए,
चेहरे पे मुस्कान चिपकाये हुए ||

फिर वो दोनों साथ बैठे है,
खुद को खुश दिखाए हुए |
सब कुछ अच्छा बताये हुए,
चेहरे पे मुस्कान चिपकाये हुए ||

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लम्हे !!

मीलो की दूरी थी,
मुलाकातें भी अधूरी थी |
तेरे होने का एहसास था,
तेरा हर लम्हा मेरे पास था ||

दूरी तो कम हो गयी,
कुछ एक मुलाकातें भी हों गयी |
न जाने क्यों सबकुछ खो गया,
तूने  पराया किया ही, अब वो लम्हा भी पराया हो गया ||

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ओझल नज़रे !!

तो क्या जो अब जुबान हर
शब्द पर लड़खड़ाया करती है
मेरे सफ़ेद बाल
मेरी उम्र बयां करती है

तो क्या ये आंसू पोछने वाले
हाथ हर वक़्त कांपते है
थोड़ा भी चल लेने पर
मेरे फेफड़े हाँफते है

फिर भी ओझल नज़रो से
तेरा चेहरा साफ़ दिखाई देता है
पापा तुम सठिया गए
ऐसा हमारा बेटा कहता है

कहता मेरी हरकतों से
उसका परिवार बेहाल हो गया है
झूठ बोलता है की तुझे दुनिया से
गए हुए कई साल हो गया है

अभी सुबह नाश्ते पे तो तुम
मेरे साथ ही बैठी थी
मुझे अकेला नहीं छोड़ोगी
ऐसा दिनों रात कहती थी

अपना दर्द मैं किसी से
कह नहीं पता हूँ
दो बातें किसी से करने को
दिन रात तरस जाता हूँ

मुझे भी हमेशा के लिए
सुला दो ना
खुद आ जाओ या फिर
मुझे वहां बुला लो ना

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अच्छा सुनो !

अच्छा सुनो !
ये जो “Forever” शब्द,
के साथ कार्ड दी थी |
उसे फाड़ दू, जला दू ?
या फिर सारी बातें
past में बना दू ?

अच्छा सुनो !
ये जो तुम कांच की,
dancing couple दी थी |
उन्हें तोड़ दू, कहीं झोक दू ?
या फिर उनको
वही रोक दू ?

अच्छा सुनो !
वो जो फूल बना,
रुमाल छूटा था मेरे पास |
उसे तुम्हे लौटा दू ?
या फिर टूटे वादों के
आंसू उसमे ही बहा दू ?

अच्छा सुनो !
वो जो कविताये,
लिखी थी तुमपर |
उसके हर लफ्ज़ मिटा दू ?
या फिर अब उनसब को
इस ज़माने को दिखा दू ?

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एक ख्वाब !!!

घाटियों के सफर में,
दिन के तीसरे पहर में ।
खुले हुए नयनो से,
एक ख्वाब बुन रहा हूँ मैं ।।

इस रंग बिरंगी दुनिया में,
कोटि कोटि अरमान है ।
उन अरमानो की बगिया में,
कुछ अरमान चुन रहा हूँ मैं ।।

इस धर्म,समाज के हल्लो में,
जो पाप पुण्य के किस्से है ।
किस्सों की इस दुनिया में,
अपनी आवाज़ सुन रहा हूँ मैं ।।

इस साफ़ हसीन यादो में,
जो दिख रही कुछ कालिख है ।
मन की उस कालिख को,
इस बार धुल रहा हूँ मैं ।।

इस मतलब की दुनिया में,
जो काफिले है मतलब के ।
उन काफिलों के लोगो की,
हर बात भूल रहा हूँ मैं ।।

खुले हुए नयनो से,
एक ख्वाब बुन रहा हूँ मैं ।
अरमानो की बगिया में,
कुछ अरमान चुन रहा हूँ मैं ।।

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मोहब्बत !!

कैसी है ये मोहब्बत,
जिससे दामन तुम बचा जाते |

बस अपने ही ख्यालो से,
तुम दिनों रात जगा जाते ||

ना बरसा था बादल फिर भी,
तुम सबकुछ यूँ भीगा जाते |

बिन छुवे तुम पर्वत को,
उसकी बर्फ पिघला जाते ||

जो नैन-नक्ष तेरे तीखे थे,
पूरी नदियाँ घुमा जाते |

चुप थे तेरे लब्ब फिर भी,
नैना तेरे सब बता जाते ||

कैसी है ये मोहब्बत,
जिससे दामन तुम बचा जाते |

बस अपने ही ख्यालो से,
तुम दिनों रात जगा जाते ||

Posted in Hindi, Poetry, Pragya's Post

ख्वाब !!

एक ख्वाब सजाते है
चलो इस जीवन को थोड़ा ख़ास बनाते है,

कौन है वो दूर खड़ा रोता
चलो उसको थोड़ा हँसा आते है,

है दूर कही कोई सपने बुनता
चलो उसके सपनो में हम भी थोड़ा हाथ बटाते है,

फूल अगर है बिखर गए
चलो उन फूलों की मालाएं बनाते है,

किसी का घर सजाते है
चलो किसी के सपनो में फिर से पंख लगाते है,

कांटो से हाथ मिलाते है
अंगारो पे हंस के जाते है,

सब कुछ भूल के हम
चलो सपनो की बगिया सजाते है,

इस जीवन का उद्देश्य बनाते है
चलो सपनो को साकार कर के आते है|