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मोहब्बत !!

कैसी है ये मोहब्बत,
जिससे दामन तुम बचा जाते |

बस अपने ही ख्यालो से,
तुम दिनों रात जगा जाते ||

ना बरसा था बादल फिर भी,
तुम सबकुछ यूँ भीगा जाते |

बिन छुवे तुम पर्वत को,
उसकी बर्फ पिघला जाते ||

जो नैन-नक्ष तेरे तीखे थे,
पूरी नदियाँ घुमा जाते |

चुप थे तेरे लब्ब फिर भी,
नैना तेरे सब बता जाते ||

कैसी है ये मोहब्बत,
जिससे दामन तुम बचा जाते |

बस अपने ही ख्यालो से,
तुम दिनों रात जगा जाते ||

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ख्वाब !!

एक ख्वाब सजाते है
चलो इस जीवन को थोड़ा ख़ास बनाते है,

कौन है वो दूर खड़ा रोता
चलो उसको थोड़ा हँसा आते है,

है दूर कही कोई सपने बुनता
चलो उसके सपनो में हम भी थोड़ा हाथ बटाते है,

फूल अगर है बिखर गए
चलो उन फूलों की मालाएं बनाते है,

किसी का घर सजाते है
चलो किसी के सपनो में फिर से पंख लगाते है,

कांटो से हाथ मिलाते है
अंगारो पे हंस के जाते है,

सब कुछ भूल के हम
चलो सपनो की बगिया सजाते है,

इस जीवन का उद्देश्य बनाते है
चलो सपनो को साकार कर के आते है|

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चीर हरण !!

वर्षो पहले की ये कहानी थी,
सुनी अपनी दादी की जुबानी थी |
हस्तिनापुर का सिंहासन था,
एक अँधा राजा और एक अंधी रानी थी ||

दो पक्षों की ये दुश्मनी पुरानी थी,
दांव पर राजपाठ, रिश्ते और पंचाली थी |
जीत गए सब कौरव,और पांच की नाकामी थी,
पासे के खेल में, मामा की बेईमानी थी ||

इंतकाम की आग थी मन में ,
मायामहल की बेइज़्ज़ती चुकानी थी |
घसीटी गयी रानी सरेआम बाल से,
इस अन्याय पे बंद सबकी वाणी थी ||

पांचाली के हश्र पर, गर्व था कुछ को,
बाकि सबकी आँखे शर्म से झुक जानी थी |
उतार के उनके वस्त्र को सभा में,
कईयों को दिखानी अपनी मर्दानी थी ||

खींच रहा था दुःशासन साड़ी उनकी,
चीख पुकार मचा रही पांचाली थी |
न था कोई भी रोकने वाला अन्याय को,
पूरी सभा के जीवन पर, ये एक बदनामी थी ||

ना उठ रहा था कोई बचाने को ,
पर द्रोपदी को खुद की इज़्ज़त बचानी थी |
देख खुद को बेबस कौरवो के सामने,
बस भगवान से ही पुकार लगनी थी ||

चीर खींच रहा था दुःशासन बेरहमों की तरह,
हे गोविन्द! हे मुरारे! हे कृष्ण, बस यही द्रौपदी की वाणी थी |
थे खुद गोविन्द ऊपर, उन्हें भक्त की लाज बचानी थी,
चमत्कार था उनका, साड़ी बढती जानी थी ||

हर रहा था चीर, सब कौरवो की मनमानी थी,
मौन धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोणाचार्य और गांधारी थी |
बढ़ती गयी साडी और खींचता रहा चीर,
कृपा के पीछे, स्वंय सुदर्शनधारी थे |

सभा में साडी का ढेर लग गया था,
एक अबला नारी को निवस्त्र करने वाला |
मर्द अब चीर खींच-खींच के थक गया था,
देख ये अद्द्भुत दृश्य, कहा कवि ने ||

“अंतहीन है ये साड़ी थी,
बची इज़्ज़त जो प्यारी थी |
सभा में हर ओर बस साड़ी थी
क्या वो साड़ी थी, या फिर रानी थी ||
क्या वो रानी की ही साड़ी थी ,
देख ये चकित सभा सारी थी |
भाई मानी जिसे रानी थी ,
चमत्कारी वो सुदर्शनधारी था ||”

देख खुद हो हारता दुर्योधन ने मुँह खोला,
“महारानी बना के रखूँगा तुझे मैं दासी” |
ये बोल खुद की जंघा पर बैठने को बोला,
सुन ये गदाधारी भीम का खून खौला ||

ऐसे ही हुआ “महाभारत” का आगाज़,
हर एक घर में जो फैला हुआ है आज |
माना की युद्ध नहीं उस जैसा
पर हर एक के मन वही बैर का अंदाज़ ||

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परछाईं !!

मेरी एक परछाईं थी ||
जब आया मैं दुनिया में,
मेरे साथ वो आयी थी |
ना ही कोई रूप था उसका,
ना ही कोई रंग लायी थी |
मेरी एक परछाईं थी ||

ना ही कोई गुरुर उसे,
खुद पर ना कभी इतरायी थी |
ना जलती थी धूप में वो,
रात से ना वो घबराई थी |
मेरी एक परछाईं थी ||

ना ही उसके नखरे थे,
ना ही कोई लड़ाई थी |
थी झील सी शांत वो,
समुंद्र सी उसकी गहराई थी |
मेरी एक परछाईं थी ||

मुझमे कुछ भी अच्छा हो,
या फिर कोई बुराई थी |
भूल के सारे तथ्यों को वो,
मेरा साथ निभाई थी |
मेरी एक परछाईं थी ||

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एक हसीना !!

भूखा हूँ तेरे कुछ लफ्ज़ का,
प्यासी है नज़रे तेरी एक झलक को |
बिन तुझे देखे, ना मैं इफ्तार करूँगा ||

माना की तू हसीन, ईद के चाँद सी,
पर एक दफा निकल तू |
खुद की आँखों में, तुझे गिरफ्तार करूँगा ||

बंद कर लूंगा तुझे मैं,
दिल की बोतल में इस कदर |
जब जी चाहे तो, तेरा दीदार करूँगा ||

तू खुद पूछेगी मुझसे,
“ऐसी क्या खूबी है मुझमे” |
इतना टूट कर तुझे मैं प्यार करूँगा ||

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तड़प !!

तरस गयी हूँ, घूमने के लिए,
बारिश में भीगने के लिए |

एक चाय का प्याला पीने के लिए,
कुछ पल उनके साथ जीने के लिए ||

उनकी आँखो में खोने के लिए,
कंधे पर सिर रख रोने के लिए |

तरस गए हम वक़्त पाने के लिए,
उनके मन के ज़ज्बात जानने के लिए ||

तरस गए है, उनसे प्यार जताने के लिए,
वो मेरे है, इस ख़ुशी पर इतराने के लिए |

प्यार के एहसास महसूस करने के लिए,
छोटी-छोटी बातों पर मोहब्बत से लड़ने के लिए ||

प्यार से उनको कुछ खत लिखने के लिए,
खत पढ़ कर,उनके अल्फ़ाज़ सुनाने के लिए |

पर उनके पास मेरे लिए वक़्त कहाँ है,
खुश है वहीं, वो अब जहाँ है ||

उसके लिए भी तो बादल बरसता होगा,
भीगने के लिए वो भी तरसता होगा ||

उसे भी तो कुछ बताना होगा ना,
शायद मुझसे प्यार जाताना होगा ना |

हकीकत ना सही ये सब,
सपने पुरे ख्वाब में करेंगे|
मिलने दो कभी,
हर एक तड़प हिसाब में करेंगे ||

Idea Credit & Original poem – “RITIKA”.  Modified by – “ROHIT”