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कसक !!

थोड़ी सी कसक ही तो है
तुझे देख न मुस्कुरा पाने की
तेरे आंसू न रोक पाने की
तुझसे रूठ जाने की
तुझे न मनाने की कसक ।
पर, जिन्दा हूँ मैं
थोड़ी सी कसक ही तो है ।।

कसक है की करीब थे
पास आने की कसक है
प्यार में टूट जाने की
खुद को भूल जाने की
तुझे चाहने की कसक ।
पर, साँस ले रहा मैं
थोड़ी सी कसक ही तो है ।।

तेरी यादो की कसक है
तेरी वादों की कसक है
जवाब, सवालों की न पाने की
तेरे चले जाने की
तेरा नाम ना भूल पाने की कसक ।
पर, खुश हूँ मैं
थोड़ी सी कसक ही तो है ।।

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Posted in Emotions, Fiction, Hindi, Poetry

हालात !

थोड़ी हवा चलती, कुछ यादो के पन्ने पलटते ।
थाम के हाथ मेरा, थोड़ा दूर और साथ चलते ।।
मेरे हालात का वास्ता देकर, छोड़ जाने वाले लोग ।
कुछ देर और रुकते, मेरे भी हालात बदलते ।।

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गुनाह !!!

हाँ, मैंने चोरी की !!!
पर खुद क लिए नहीं,
उसके लिए की |
जो अपना सबकुछ,
हँस के दुसरो को दे देती है ||
जो सबके हर तकलीफ,
हँस के सुन लेती है |
जो अपने सारे गम,
चुपचाप सह लेती है ||

हाँ, मैंने चोरी की !!!
चुराया मैंने,
अपने जिंदगी से
कुछ लम्हे |
बस उसके लिए ||
उन लम्हो में ,
मैं उसे हँसाऊँगा |
उसे उसकेहोने का,
एहसास दिलायूँगा ||

हाँ, मैंने चोरी की !!!
बस और बस उसके लिए,
और अगर इस गुनाह
की सजा मौत है |
तो जनाब !!!
नहीं डरता मैं मौत से ||

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मैं कवि हूँ !!!

ख़ुशी, दुःख, हँसी और आंसू
सबकुछ एक साथ लिखता हूँ
मुस्कान की चमक को दिन
जुल्फ के अंधेरो को रात लिखता हूँ
मैं कवि हूँ
लोगो के जज़्बात लिखता हूँ

शर्म से आँख झुकाना हो
कुछ कहने से घबराना हो
पहली नज़र, पहली मुस्कान से लेकर
हर एक मुलाकात लिखता हूँ
मैं कवि हूँ
मन की बात लिखता हूँ

मिलन का प्रेम हो
या विरह की पीड़ा
दिल धड़कना, घबराना
सब एक साथ लिखता हूँ
मैं कवि हूँ
इश्क़ के अल्फ़ाज़ लिखता हूँ

धर्म, समाज या राजनीति हो
तेज़ाब, दुष्कर्म, दहेज़ से
बेबस हमारे देश की बेटी हो
सब पर अपने ख्यालात लिखता हूँ
मैं कवि हूँ
कमज़ोर, बेबस की आवाज़ लिखता हूँ

लोगो की बेड़ियाँ तोड़ कर
विचार अपने आज़ाद लिखता हूँ
कल क्या हुआ, ना पता
क्या क्या होगा, क्या पता
मैं कवि हूँ
मैं बस और बस आज लिखता हूँ

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ख़ामोशी…एक चीख

एक अर्सा बीत गया था,
एक-दूसरे को कुछ बताये हुए |
बेख़ौफ़ नज़रे मिलाये हुए,
एक साथ मुस्कुराये हुए ||
कुछ गांठे पड़ गयी थी,
मन में बातें छुपाये हुए |
ग़लतफ़हमी बिन सुलझाए हुए,
हालत को दोषी बनाये हुए ||

फिर वो दोनों साथ बैठे है,
खुद को खुश दिखाए हुए  |
कुछ न हुआ ये जताये हुए,
अंदर के तूफान को छुपाये हुए ||
रूह के सवालो को दबाये हुए,
मन के शोर को खामोश कराये हुए |
सब कुछ अच्छा बताये हुए,
चेहरे पे मुस्कान चिपकाये हुए ||

फिर वो दोनों साथ बैठे है,
खुद को खुश दिखाए हुए |
सब कुछ अच्छा बताये हुए,
चेहरे पे मुस्कान चिपकाये हुए ||

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लम्हे !!

मीलो की दूरी थी,
मुलाकातें भी अधूरी थी |
तेरे होने का एहसास था,
तेरा हर लम्हा मेरे पास था ||

दूरी तो कम हो गयी,
कुछ एक मुलाकातें भी हों गयी |
न जाने क्यों सबकुछ खो गया,
तूने  पराया किया ही, अब वो लम्हा भी पराया हो गया ||

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ओझल नज़रे !!

तो क्या जो अब जुबान हर
शब्द पर लड़खड़ाया करती है
मेरे सफ़ेद बाल
मेरी उम्र बयां करती है

तो क्या ये आंसू पोछने वाले
हाथ हर वक़्त कांपते है
थोड़ा भी चल लेने पर
मेरे फेफड़े हाँफते है

फिर भी ओझल नज़रो से
तेरा चेहरा साफ़ दिखाई देता है
पापा तुम सठिया गए
ऐसा हमारा बेटा कहता है

कहता मेरी हरकतों से
उसका परिवार बेहाल हो गया है
झूठ बोलता है की तुझे दुनिया से
गए हुए कई साल हो गया है

अभी सुबह नाश्ते पे तो तुम
मेरे साथ ही बैठी थी
मुझे अकेला नहीं छोड़ोगी
ऐसा दिनों रात कहती थी

अपना दर्द मैं किसी से
कह नहीं पता हूँ
दो बातें किसी से करने को
दिन रात तरस जाता हूँ

मुझे भी हमेशा के लिए
सुला दो ना
खुद आ जाओ या फिर
मुझे वहां बुला लो ना