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एक जानवर …..इंसान !

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

जो कमाता है,
और भूखे भी खुद मर जाता है ।
कपडे पहनता है,
और फाड़ कर, इज़्ज़त भी लूट जाता है ।।

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

रिश्ते रखता है,
और उन्हें ही, शर्मशार कर जाता है।
खुद के उगाये अन्न में,
खुद ही ज़हर मिलता है।।

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

जाति-धर्म के नाम पर,
हर पल रक्त बहता है।
मारने को खुद को,
तरह-तरह के हथियार बनता है।।

एक जानवर है,
इंसान कहलाता है।

Image Credit – Google

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Author:

Not organized, But you will not find it messy. Not punctual, But will be there at right Time. Not supportive, But will be there, when needed. Not a writer, But you will find this interesting.

13 thoughts on “एक जानवर …..इंसान !

  1. कुछ लाइनें हैं
    जो कविता कहलाती हैं
    कितनी बारीकी से
    कड़वा सच कह जाती हैं
    और कवि के सोच की
    गहराई बखूबी दर्शाती हैं |

    बहुत बहुत साधुवाद |

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  2. बेहतरीन कविता लिखी है आपने।
    एक जानवर है,
    इंसान कहलाता है।

    हो सकता है जानवर भी दया कर जाए,
    पर्वत भी पिघल जाए,
    मगर सृष्टि की एक कृति है जो
    सब का काल कहलाता है,
    वो कोई और नहीं
    वो इंसान कहलाता है।

    Liked by 1 person

  3. हां जी!! बेहद खूबसूरत कविता है-पर सोचिये जरा कि इंसान को अब जानवर कहने में भी शर्म आती है।जानवरों का अपमान नजर आता है।मनुष्य ने तो जानवरों को भी पीछे छोङ दिया है अपनी हैवानियत से।क्या मैं सही कह रही हूं।

    Liked by 1 person

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